नए अनुभवहिन्दी
पवनचक्की वाली डॉक्टर दीदी
मीतू को आज अपने दिल की धक-धक सुननी थी। डॉक्टर दीदी के पास एक सुनने वाली नली थी, और मीतू ने सुना था कि उससे दिल बोलता है।
मीतू और मम्मी सुबह-सुबह घर से चलीं। थोड़ी दूर जाकर रास्ता दो तरफ़ बँट गया। एक रास्ता बाएँ गया, एक दाएँ।
“मम्मी, किधर?” मीतू ने पूछा।
“अरे, मैं भी भूल गई,” मम्मी ने हँसकर कहा। “तुम बताओ।”
मीतू ने बाएँ रास्ते को चुना। वह रास्ता सीधा तालाब पर पहुँचा। बत्तखें बोलीं, “क्वैक-क्वैक!” वहाँ डॉक्टर दीदी नहीं थीं।
“चलो, दूसरी तरफ़,” मीतू ने कहा।
दाएँ रास्ते पर एक बकरी बँधी थी। वह मीतू का रूमाल चबाने लगी। वहाँ भी डॉक्टर दीदी नहीं थीं।
मीतू रुक गई। उसने ऊपर देखा। पेड़ों के ऊपर एक पवनचक्की झाँक रही थी।
“मम्मी, डॉक्टर दीदी के दरवाज़े के पास पवनचक्की है न?”
“हाँ, है तो!”
“तो हमें उसी की तरफ़ चलना है!”
पर पवनचक्की का एक नियम था। जब कोई उसे नहीं देखता, तो वह उलटी घूमती थी। सब यह जानते थे, और किसी को अजीब नहीं लगता था। मीतू ने उसे देखा, तो वह सीधी घूम रही थी। मीतू ने झट से मुँह फेरा। पीछे से आवाज़ आई, “चर्र-चर्र, चर्र-चर्र।” वह उलटी घूम रही थी!
मीतू खिलखिला पड़ी। फिर उसने पवनचक्की को देखते-देखते पैर बढ़ाए, और मम्मी का हाथ पकड़कर चलती गई। बीच में एक बार चुपके से मुड़ी, तो चर्र-चर्र फिर उलटी हो गई।
थोड़ी देर में लाल दरवाज़ा आ गया।
डॉक्टर दीदी ने नली मीतू की कमीज़ के पास रखी। नली थोड़ी ठंडी थी।
“चुप होकर सुनो,” दीदी ने कहा।
मीतू ने साँस रोक ली। फिर सुना।
धक-धक, धक-धक।
बाहर पवनचक्की चर्र-चर्र घूम रही थी, और अंदर मीतू का दिल धक-धक बोल रहा था।