नए अनुभवहिन्दी
मीनू की सीख वाली पीली मछली
मीनू को स्कूल में अपना लाल बस्ता अपने हुक पर टाँगना था।
आज स्कूल का पहला दिन था। टीचर जी ने कहा था, “मीनू, तुम्हारे हुक पर पीली मछली बनी है।”
मीनू दीवार के पास गई। वहाँ बहुत सारे हुक थे। किसी पर सेब था, किसी पर पतंग, किसी पर सूरज। पर पीली मछली कहीं नहीं थी।
“पीली मछली वाला हुक कहाँ है?” मीनू ने धीरे से पूछा। किसी ने नहीं सुना। सब बच्चे अपने बस्ते टाँगने में लगे थे।
मीनू ने सारे हुक गिने। एक, दो, तीन... पर बच्चे आते-जाते रहे, बस्ते हिलते रहे, और गिनती गड़बड़ हो गई। उसने फिर गिना। फिर गड़बड़ हो गई।
तभी फर्श पर उसे गाजर के छोटे-छोटे टुकड़े दिखे। वे एक कतार में बिछे थे। मीनू उन्हें देखती-देखती चल पड़ी।
कतार के आख़िर में कक्षा का खरगोश चुनू बैठा था। वह किसी बच्चे के टिफिन से गिरे टुकड़े खा रहा था। उसे मीनू से कोई काम नहीं था, उसे तो बस अपनी गाजर चाहिए थी। मीनू ने देखा कि उसके पिछले पैर पर कुछ पीला चमक रहा है।
पीली मछली!
“चुनू, रुको!” मीनू ने कहा। पर चुनू फुदक-फुदक करके आगे कूद गया।
मीनू भी पीछे-पीछे गई। चुनू आख़िरी टुकड़े पर रुका, ठीक दीवार के सबसे आख़िरी हुक के नीचे। उस हुक पर कोई तस्वीर नहीं थी।
मीनू ने धीरे से मछली को उसके पैर से उतारा। “ये मेरी है, चुनू। यहाँ से गिर गई थी।”
उसने मछली को खाली हुक पर दबाकर चिपका दिया। फिर अपना लाल बस्ता उस पर टाँग दिया।
टन-टन-टन! घंटी बज गई।
बस्ता थोड़ा-सा झूला, और पीली मछली उसके पास चमकती रही। नीचे चुनू कुर-कुर करके गाजर चबाता रहा।