नए अनुभवहिन्दी
नीलू का हिलता दाँत
नीलू सब्ज़ियों के बगीचे में गाजर खींच रही थी। किनारे पर पुदीना और धनिया लगे थे, और मधुमक्खियाँ गुनगुन कर रही थीं।
नीलू का आगे का एक दाँत हिल रहा था। हिल-हिल, डुल-डुल। आज ही उसे यह दाँत टिन के डिब्बे में रखना था। दादी कहती थीं, जो दाँत सूरज डूबने से पहले डिब्बे में पहुँच जाए, उसे रात को चाँद-चुहिया ले जाती है। और बदले में एक चमकीला कंकड़ छोड़ जाती है।
“सूरज डूबने से पहले,” नीलू ने कहा। “दाँत, जल्दी निकल जाओ।”
उसने उँगली से दाँत खींचा। उँगली फिसल गई। फिर जीभ से धक्का दिया। दाँत हिला, पर वहीं टिका रहा। हिल-हिल, डुल-डुल।
सूरज थोड़ा और नीचे उतर आया।
“अब क्या करूँ?” नीलू ने पुदीने से पूछा। पुदीना कुछ नहीं बोला। एक मधुमक्खी उसकी नाक पर आकर बैठी, गुनगुन किया और उड़ गई। नीलू खिलखिलाकर हँस पड़ी।
तभी उसने अपने हाथ की गाजर को देखा। मोटी, नारंगी और कुरकुरी।
“अरे! मैं इसे काटकर देखती हूँ,” उसने सोचा।
उसने गाजर के सिरे को आगे के दाँतों से पकड़ा और धीरे से काटा। कुरर! फिर ज़ोर से खींचा।
टक!
गाजर हाथ में रह गई। नीलू ने जीभ घुमाई। वहाँ एक छोटी-सी खाली जगह थी! और गाजर में एक नन्हा, सफ़ेद दाँत चिपका हुआ था, जैसे चावल का दाना।
“दाँत निकल गया!” नीलू चिल्लाई।
“नीलू! सूरज उतर रहा है, हाथ धो लो!” खिड़की से दादी की आवाज़ आई।
नीलू ने दाँत को गाजर से निकाला और दौड़ी। तुलसी के गमले के पास रखा टिन का डिब्बा खोला। दाँत अंदर रखा। ढक्कन बंद किया। टन!
सूरज पके टमाटर जैसा लाल हो गया था। बगीचे में धनिया की ख़ुशबू थी। मधुमक्खियाँ धीमे-धीमे गुनगुना रही थीं। नीलू ने जीभ से खाली जगह को छुआ, और मुस्कुरा दी।