नए अनुभवहिन्दी
मीनू और गुलाबी खीर
"ये गुलाबी-गुलाबी क्या है, दादी?" मीनू ने कटोरी में झाँककर पूछा।
दादी चूल्हे पर रोटी सेंक रही थीं। "चुकंदर की खीर है, मीनू। आज पहली बार बनाई है। चखकर बताओ, कैसी बनी?"
मीनू को चखनी थी। दादी ने सुबह से मेहनत की थी, और मीनू को बताना था कि खीर कैसी है। पर उसकी छोटी चम्मच कल ही टूट गई थी। रसोई में बस एक बड़ी चम्मच थी।
मीनू ने बड़ी चम्मच भरी और मुँह में डाल ली। गप!
"ऊँह!" उसने मुँह बनाया। इतनी सारी खीर एक साथ! उसे मिट्टी जैसा स्वाद आया।
"नहीं खाऊँगी," मीनू बोली।
"कोई बात नहीं," दादी ने रोटी पलटते हुए कहा। "जब मन करे, तब चखना।"
बाहर फाटक हवा से चरमराया। चूँ-चीं-चूँ, चूँ-चीं-चूँ। फाटक रोज़ यही धुन गुनगुनाता था, और मीनू को यह अच्छा लगता था।
मीनू ने फिर कटोरी देखी। इस बार उसने नाक पकड़ी और चम्मच भरकर खाई। पर अब भी वही मिट्टी वाला स्वाद आया।
तभी उसने कुछ देखा। खीर के ऊपर एक किशमिश तैर रही थी। उसे किशमिश बहुत पसंद थी। उसने नाक छोड़कर खीर को सूँघा। उसमें इलायची की खुशबू थी, बिलकुल वैसी, जैसी रोज़ वाली खीर में होती है।
"ज़रा-सा, बस ज़रा-सा," मीनू ने खुद से कहा।
उसने बड़ी चम्मच की नोक पर थोड़ी-सी खीर ली, उस पर किशमिश रखी और जीभ से छुआ।
मीठा! ठंडा और मीठा, और इलायची वाला।
मीनू ने आँखें बड़ी कर लीं। फिर एक नोक, फिर दूसरी नोक। फिर चम्मच भरकर।
"दादी," उसने कहा, "ये तो गुलाबी बादल जैसी है!"
दादी मुस्कुराईं। मीनू की नाक पर गुलाबी निशान लग गया था। कटोरी में चम्मच टन-टन करती रही, और बाहर फाटक धीरे-धीरे अपनी धुन गुनगुनाता रहा। चूँ-चीं-चूँ, चूँ-चीं-चूँ।