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मीनू की लाल साइकिल
मीनू की लाल साइकिल पगडंडी पर डगमग-डगमग चल रही थी। मीनू ने हैंडल कसकर पकड़ रखा था और उसकी आँखें अपने पैरों पर थीं।
आज उसे आम के पेड़ से बगीचे के फाटक तक जाना था, पैर नीचे रखे बिना। फाटक पर पीतल की घंटी टँगी थी। मीनू साइकिल पर बैठे-बैठे उसे बजाना चाहती थी।
“एक, दो, तीन, चलो!”
डगमग, डगमग, टप! मीनू का पैर ज़मीन पर आ गया।
उसने फिर कोशिश की। “एक, दो, तीन, चलो!” इस बार उसने पैडल बहुत तेज़ घुमाए। साइकिल एक तरफ़ मुड़ी और धप्प! मीनू नरम घास में जा गिरी। साइकिल भी बगल में लेट गई, और उसकी टोपी हवा में उड़ गई।
मीनू घास पर बैठ गई। “उफ़्फ़! तेज़ चलाने से भी नहीं हुआ।”
तभी कहीं से आवाज़ आई, “चीं-चीं-चीं।”
मीनू ने साइकिल की घंटी देखी। फिर पहिए देखे। “तुम बोल रही हो?” साइकिल कुछ नहीं बोली। “चीं-चीं-चीं,” आवाज़ फिर आई।
मीनू ने साइकिल उठाई और बैठ गई। इस बार वह धीरे-धीरे चली और गर्दन घुमाकर आवाज़ ढूँढने लगी। पेड़ के पीछे देखा, गमले के पास देखा। चीं-चीं-चीं!
और साइकिल सीधी चलती रही। सीधी, सीधी, सीधी!
“अरे!” मीनू हँस पड़ी। “जब मैं सामने देखती हूँ, तो साइकिल सीधी चलती है!”
अब उसने सीधे फाटक की घंटी को देखा। पैडल घूमे, पहिए सरसराए, और घंटी पास आती गई। मीनू ने हाथ बढ़ाया। टन-टन!
उसी पल पीछे से कुड़क-कुड़क करती मुर्गी दौड़ती आई। वह अपना खोया हुआ चूज़ा ढूँढ रही थी। साइकिल की टोकरी में से एक छोटा पीला चूज़ा फुदककर बाहर कूदा।
“चीं!” उसने कहा और माँ के पंखों में छिप गया।
मीनू ने पैर नीचे रखे बिना साइकिल रोकी। पहिए टिक-टिक करते धीमे हुए, और घंटी अब भी हल्के-हल्के हिल रही थी।