दोस्ती और दयालुताहिन्दी
मीनू की लाल फ़ीते वाली राखी
मीनू को आँगन की मिट्टी में एक सुनहरा फूल पड़ा मिला। उसने उसे उठाया। अरे, यह तो राखी का फूल है! पर उसमें धागा नहीं था।
आज राखी थी। मीनू को अपने छोटे भाई गोलू की कलाई पर राखी बाँधनी थी। गोलू दरवाज़े पर हाथ आगे बढ़ाए खड़ा था।
“जल्दी करो, दीदी! मेरी कलाई इंतज़ार करते-करते थक गई।”
“अब धागा कहाँ से लाऊँ?” मीनू ने सोचा।
बाहर कोहरा था। मुर्गा बाड़े पर चढ़कर बोला, “कूँ-कू-ड़ू-कूँ! चार बजे… तीन बजे… दो बजे!” कोहरे वाली सुबह में वह घंटे उल्टे गिनता था। यह सबको पता था, इसलिए कोई हँसता नहीं था। मुर्गा तो बस कीड़े ढूँढने आया था। वह आँगन में चोंच मार-मारकर घूमता रहा।
मीनू ने घास का एक लंबा तिनका तोड़ा। उसे फूल में पिरोया और गोलू की कलाई पर बाँधने लगी। टप! तिनका टूट गया।
“अब धागा कहाँ से लाऊँ?”
उसने पतंग की डोरी उठाई। पर डोरी मोटी थी और फूल का छेद छोटा। डोरी अटक गई, बिलकुल नहीं निकली।
“दीदी, जल्दी!” गोलू ने हाथ हिलाया।
मीनू ने गोलू की हिलती कलाई को देखा। तभी उसकी चोटी आगे आकर उसकी आँख के पास झूल गई। चोटी पर लाल फ़ीता बँधा था, बिलकुल फूल जैसा चमकीला।
“अरे!” मीनू ने फ़ीता खोल लिया। उसे फूल के छेद में पिरोया, और वह आराम से निकल गया। फिर उसने गोलू की कलाई पर कसकर गाँठ बाँधी।
फ़ीता बहुत लंबा था। दोनों सिरे नीचे लटक गए।
“मेरी राखी की तो पूँछ है!” गोलू खिलखिलाकर हँसा।
मुर्गा बोला, “एक बजे!” और उसने आँगन से एक कीड़ा पकड़ लिया।
कोहरा धीरे-धीरे हटने लगा। गोलू ने कलाई ऊपर उठाई, और लाल फ़ीते के दोनों सिरे हवा में फहरने लगे।