कल्पना और अचरजहिन्दी
मीनू की छींक और टूटता तारा
मीनू की छींक पूरे गाँव में सबसे ज़ोर की थी। जब वह छींकती, तो बाड़ पर बैठी मुर्गियाँ धप से नीचे गिर जाती थीं।
आज रात मीनू को टूटता तारा देखना था। दादी ने कहा था, “टूटता तारा बस एक साँस भर दिखता है। उसे देखकर जो माँगो, वही मिलता है।” मीनू को एक छोटा-सा पिल्ला माँगना था।
वह छत पर लेट गई। आँगन में मधुमक्खियों का छत्ता था। इस गाँव में छत्ता हर रात लोरी गुनगुनाता था, हूँऽ… हूँऽ… हूँऽ… किसी को यह अजीब नहीं लगता था।
मीनू आसमान देखती रही। हूँऽ… हूँऽ… उसकी आँखें मिचने लगीं। फिर झटके से खुल गईं।
“अरे! तारा निकल तो नहीं गया?”
उसने गाल पर चुटकी काटी। फिर भी जम्हाई आ गई। वह एक पैर पर खड़ी हुई, पर धम से बैठ गई। हूँऽ… हूँऽ… आँखें फिर बंद होने लगीं।
तभी एक देर से लौटती मधुमक्खी भिनभिन करती आई। उसे बस अपने छत्ते तक पहुँचना था। रास्ते में वह मीनू की नाक पर बैठ गई।
“आँछी!”
मधुमक्खी लट्टू की तरह घूमती हुई सीधे छत्ते में जा गिरी। छत्ता बोला, “हूँऽ… हूँऽ… हिच!” मीनू हँस पड़ी।
फिर उसने सोचा, “मेरी छींक तो मुझे जगा देती है!”
छत पर मुर्गी का एक पंख पड़ा था। मीनू ने उसे उठा लिया। जैसे ही आँखें भारी हुईं, उसने पंख नाक पर फिराया।
“आँछी!” आँखें पूरी खुल गईं।
हूँऽ… हूँऽ… फिर पंख। “आँछी!”
तभी आसमान में चाँदी की एक पतली लकीर चमकी। बस एक साँस भर।
“वो रहा!” मीनू ने धीरे से कहा, और अपनी माँग फुसफुसा दी।
लकीर बुझ गई। नीचे छत्ता फिर गुनगुनाने लगा, हूँऽ… हूँऽ… मीनू ने पंख को छाती पर रखा, और लोरी उसके कानों में धीरे-धीरे घुलती गई।