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परिवार और घरहिन्दी

मीनू और कांच की बरनी

मीनू आँगन की मुंडेर पर मिट्टी के दीये रख रही थी। एक, दो, तीन... पूरे दस। आज दिवाली की रात थी, और मीनू को सारे दीये अपने हाथ से जलाने थे।

“धीरे-धीरे जलाना, मीनू,” अम्मा ने रसोई से आवाज़ दी। “मैं मिठाई निकाल रही हूँ।”

मीनू ने छोटी मोमबत्ती उठाई। यह घर की वही मोमबत्ती थी, जिसे देखते रहो तो वह और धीरे जलती है। सब यह जानते थे। मीनू ने उसे टकटकी लगाकर देखा। लौ सीधी खड़ी रही।

उसने लौ को पहले दीये की बाती से छुआया। चट! बाती जल उठी। फिर दूसरा दीया जला। फिर तीसरा। तभी हवा आई, “सर्र!” और मोमबत्ती बुझ गई।

मीनू ने माचिस से उसे फिर जलाया। इस बार उसने दोनों हथेलियाँ आगे लगा लीं। लेकिन हवा फिर आई, और लौ फिर गई।

तभी एक भूरी बिल्ली मुंडेर पर कूदी। वह दीयों की गरमी में बैठने आई थी। वह तीसरे दीये के पास गोल होकर बैठी और उसे सूँघने लगी। “छीं!” बिल्ली ने छींका, और तीसरा दीया भी बुझ गया।

मीनू को रोना आने लगा। उसने एक लंबी साँस ली और इंतज़ार किया। तभी उसने देखा कि पहला दीया तुलसी के गमले के पीछे अब भी जल रहा है। हवा वहाँ पहुँच ही नहीं रही थी।

“अरे! हवा वहाँ नहीं जाती!” मीनू बोली।

उसे सीढ़ी पर अम्मा की खाली कांच की बरनी दिखी। मीनू ने मोमबत्ती जलाकर बरनी के अंदर रखी और बरनी को लिटा दिया। लौ सीधी खड़ी रही, जैसे छोटे से घर में बैठी हो। मीनू ने बरनी का मुँह एक बाती के पास झुकाया। चट! फिर अगली के पास। चट! चट!

जब दसवाँ दीया जला, तो पूरी मुंडेर चमक उठी। बिल्ली कांच के पास आकर बैठ गई। मीनू ने मोमबत्ती को देखा, और वह बरनी के अंदर धीरे-धीरे जलती रही। बिल्ली की गुरगुर दीयों की रोशनी में धीमे-धीमे गूँज रही थी।