कल्पना और अचरजहिन्दी
मीनू और बोलता दरवाज़ा
“खोलो, खोलो, चाबी ऊपर है!” बग़ीचे की दीवार के छोटे दरवाज़े से आवाज़ आई, और मीनू टिफ़िन लेकर वहीं रुक गई।
बग़ीचे में सब जानते थे कि यह दरवाज़ा बोलता है। इसके पार सीधे तालाब था। वहाँ दादाजी अपनी छोटी नाव में बैठे थे, और मीनू उनके लिए गरम पराँठे लाई थी। पराँठे ठंडे हो जाएँ, यह मीनू को बिलकुल नहीं चाहिए था।
चाबी दीवार के ऊँचे कील पर टँगी थी। मीनू ने उछलकर हाथ बढ़ाया। नहीं पहुँची। फिर उसने फिर से उछला। फिर भी नहीं।
“खोलो, खोलो, चाबी ऊपर है!” दरवाज़ा बोला।
“हाँ, मैं कोशिश कर रही हूँ,” मीनू ने कहा।
वह स्टूल खींचकर लाई और उस पर चढ़ गई। स्टूल डगमग-डगमग हिला। चाबी अब भी ज़रा-सी ऊपर थी। कील पर एक चिड़िया बैठी थी। वह चाबी की डोरी से धागे का एक सिरा खींच रही थी, क्योंकि उसे अपने घोंसले के लिए धागा चाहिए था। उसे मीनू की कोई मदद नहीं करनी थी।
मीनू स्टूल से उतरकर सोचने लगी। तभी उसने दीवार के पास दादी की छड़ी देखी। छड़ी का सिरा मुड़ा हुआ था, बिलकुल छोटे हुक जैसा।
मीनू ने छड़ी उठाई। उसने मुड़ा सिरा चाबी की डोरी में फँसाया और धीरे से ऊपर उठाया। चाबी खिसकी और टन् से नीचे आ गई। चिड़िया धागे का टुकड़ा लेकर फुर्र से उड़ गई।
मीनू ने चाबी घुमाई। दरवाज़े ने बड़ी-सी छींक मारी, “आऽऽ छी!” और झटके से खुल गया।
सामने तालाब था, शीशे जैसा चिकना। किनारे पर नाव हल्के-हल्के हिल रही थी।
“अरे, मेरी मीनू आ गई!” दादाजी बोले।
मीनू नाव में बैठ गई और टिफ़िन खोला। पराँठों से अभी भी भाप उठ रही थी। पानी पर एक छोटी-सी लहर फैली और चुपचाप किनारे तक चली गई।