कल्पना और अचरजहिन्दी
मीनू की लाल नाव
“चल मेरी नाव, चल!” मीनू ने कहा।
उसने अभी-अभी अपनी लाल कागज़ की नाव पानी में रखी थी। बाहर बारिश हो रही थी। आँगन से होकर एक पतली धार बह रही थी। मीनू चाहती थी कि उसकी नाव बहते-बहते आँगन के आख़िर वाले बड़े गड्ढे तक पहुँचे, जहाँ पानी तालाब जैसा दिखता था।
नाव चल पड़ी। छप-छप, छप-छप। मीनू भी साथ-साथ दौड़ी।
अचानक नाव रुक गई। अमरूद की एक नीची डाल पानी में झुकी थी, और नाव का नुकीला सिरा उसके पत्ते में अटक गया था।
“चल मेरी नाव, चल!” मीनू ने फिर कहा। नाव नहीं हिली।
मीनू ने डाल पकड़कर खींची। डाल झुकी, पर टूटी नहीं, और नाव वहीं अटकी रही। फिर उसने हाथ बढ़ाया, पर उसका हाथ बहुत छोटा था। फिर उसने एक सींक उठाई और नाव को धकेला। नाव और ज़्यादा फँस गई।
पास में एक मेंढक बैठा था। वह तो बस बारिश में नहाने आया था। “टर्र-टर्र,” वह बोला, और छपाक से पानी में कूद गया। उसकी लहर से नाव ज़रा-सी डोली।
मीनू ने ध्यान से देखा। जब डाल नीचे झुकती थी, तब नाव थोड़ी ढीली हो जाती थी।
“अच्छा!” मीनू ने सोचा। “डाल को नीचे पकड़े रखूँगी।”
उसने दोनों हाथों से डाल को खींचा और नीचे ही थामे रखा। धार ने नाव को हल्का-सा धक्का दिया। नाव का सिरा पत्ते से फिसल गया, और वह आज़ाद हो गई!
“चल मेरी नाव, चल!” मीनू हँस पड़ी।
उसने डाल छोड़ दी। डाल सर्र से ऊपर उछली, और पत्तों का सारा पानी मीनू के सिर पर बरस पड़ा। टपाटप, टपाटप!
मीनू भीग गई, पर उसे बिल्कुल बुरा नहीं लगा। लाल नाव धार में हिलती-डुलती आगे बढ़ती जा रही थी। बारिश छत पर ढोल की तरह बज रही थी, मेंढक टर्र-टर्र कर रहा था, और मीनू की चोटी से ठंडी बूँदें टपक रही थीं।