परिवार और घरहिन्दी
छोटी कटोरी कहाँ गई
गाँव के एक छोटे से घर के आँगन में धूप बिछी थी। मीनू वहीं बैठी थी, और उसके सामने मिट्टी की कटोरियाँ रखी थीं।
आज ननिहाल से नाना आ रहे थे। हर बार नाना कहते थे, "मीनू, अपनी कटोरियाँ बड़ी से छोटी तक सजाओ।" इस बार मीनू चाहती थी कि नाना के आते ही सब कतार में रखी मिलें।
उसने बड़ी कटोरी रखी। फिर उससे छोटी, फिर उससे भी छोटी, फिर और छोटी। पर सबसे छोटी कटोरी कहीं नहीं थी।
"छोटी कटोरी कहाँ गई?" मीनू ने पूछा।
वह खाट के नीचे गई। वहाँ बस एक चप्पल मिली। वह मटके के पीछे गई। वहाँ बस एक सूखा पत्ता मिला।
"छोटी कटोरी कहाँ गई?"
तभी मुर्गी माँ अपने चूज़ों के साथ आँगन में आई। टक-टक-टक! उसे कटोरी से कोई काम नहीं था। वह तो बस दाना ढूँढ रही थी।
मीनू धम से बैठ गई। ढूँढने से कटोरी नहीं मिली थी। अब क्या करे? उसने कतार की खाली जगह को देखा। वहाँ कोई छोटी-सी चीज़ चाहिए थी, बस इतनी-सी।
अचानक उसे कुछ याद आया। वह दौड़कर अंदर गई और दिवाली का बचा हुआ एक छोटा दीया ले आई। उसने उसे कतार के आख़िर में रख दिया। वह ठीक बैठ गया!
बाहर से आवाज़ आई, ठक-ठक-ठक। नाना की छड़ी!
"नाना!" मीनू दौड़ी।
नाना ने कतार देखी और हँस पड़े। "वाह! पाँचों बड़ी से छोटी तक!"
तभी सबसे छोटा चूज़ा फुदककर आया। वह सीधा दीये में चढ़ा और गोल होकर बैठ गया। "चीं!"
नाना ने कहा, "देखो, इसे तो बिस्तर मिल गया।"
मीनू ने नाना का हाथ पकड़ लिया। धूप गरम थी, और दीये में चूज़ा धीरे-धीरे बोल रहा था, "चीं... चीं..."