परिवार और घरहिन्दी
मीनू और छन-छन वाला भालू
नए घर के कमरे में डिब्बों का पहाड़ खड़ा था।
मीनू अपने भालू को ढूँढ रही थी। भालू का नाम भूरू था, और उसके गले में एक छोटी घंटी बँधी थी। रात होने वाली थी, और भूरू के बिना मीनू को नींद नहीं आती थी।
"पापा, भूरू कहाँ है?"
"किसी डिब्बे में, बेटा। मैं रसोई जमा रहा हूँ। तुम ढूँढ लो।"
मीनू ने पहला डिब्बा खोला। उसमें किताबें थीं। "यह डिब्बा नहीं, यह भी नहीं।" दूसरे में तौलिये निकले। तीसरे में जूते। सारे डिब्बे एक जैसे भूरे थे, और बहुत सारे थे।
मीनू फर्श पर बैठ गई। फिर उसे कुछ याद आया।
"भूरू की घंटी बजती है! मैं डिब्बे हिलाकर देखती हूँ।"
उसने एक डिब्बा उठाकर हिलाया। छन-छन! मीनू की आँखें चमक उठीं। उसने जल्दी से ढक्कन खोला। अंदर चम्मचें थीं।
"यह डिब्बा नहीं, यह भी नहीं," मीनू ने मुँह फुलाकर कहा। चम्मचें भी छन-छन करती थीं!
उधर रसोई से ठन-ठन, ठन-ठन की आवाज़ आ रही थी। पापा पतीले रख रहे थे। मीनू ने कान पर हाथ रखा। इतने शोर में भूरू की घंटी कैसे सुनाई देती?
वह रसोई में दौड़ी।
"पापा, एक मिनट चुप! बिल्कुल चुप!"
पापा ने पतीला हवा में पकड़े-पकड़े रोक लिया। घर में सन्नाटा हो गया। मीनू ने आँखें बंद कीं और सुना।
बहुत धीरे से, मेज़ के नीचे से आवाज़ आई। छन-छन।
मीनू झुककर मेज़ के नीचे गई। वहाँ एक डिब्बा था, जिस पर बड़े अक्षरों में लिखा था "रसोई"। उसने ढक्कन उठाया। ऊपर एक रुमाल रखा था, और उसके नीचे भूरू मुँह निकालकर बैठा था।
"पापा, यह रसोई वाले डिब्बे में था!"
पापा हँस पड़े। "मैंने गलत डिब्बे पर लिख दिया था।"
उस रात मीनू अपने नए बिस्तर पर लेटी। खिड़की के बाहर एक तारा टिमटिमा रहा था। उसने भूरू को कसकर पकड़ा। जब वह करवट बदलती, भूरू की घंटी बहुत धीरे से बजती। छन-छन। छन-छन।