परिवार और घरहिन्दी
मीनू की गोल रोटी
“आज की रोटी मैं बनाऊँगी,” मीनू ने कहा।
वह नानी की रसोई में खड़ी थी। उसे नानी की थाली के लिए एक गोल रोटी बनानी थी, पूरे चाँद जैसी। नानी दरवाज़े पर सब्ज़ीवाले से बात कर रही थीं। चूल्हे के पास मोती बिल्ली बैठी थी। वह गुनगुने दूध के कटोरे का इंतज़ार कर रही थी।
मीनू ने परात से आटे की छोटी लोई उठाई। आटा रुई जैसा नरम था। उसने लोई को तख्ते पर रखा और बेलन चलाया। आटा बेलन से चिपक गया। रोटी बनी टेढ़ी-मेढ़ी, किसी फटे पत्ते जैसी।
“थोड़ा और आटा डालती हूँ,” मीनू ने सोचा।
उसने ढेर सारा सूखा आटा छिड़का। फूँऽऽ! सफ़ेद बादल उठा।
“आँछी!” मीनू छींकी।
“आँछी-म्याऊँ!” मोती ने भी छींका। मीनू हँस पड़ी। पर रोटी अब भी टेढ़ी थी।
उसने इस बार ज़ोर से दबाकर बेला। रोटी बीच से फट गई। मीनू ने मुँह फुलाया। फिर उसे याद आया कि नानी कैसे बेलती हैं। नानी एक बार बेलती थीं, फिर रोटी को ज़रा-सा घुमा देती थीं।
“थोड़ा बेलो, थोड़ा घुमाओ,” मीनू ने धीरे से कहा।
उसने एक बार बेला। फिर रोटी को घुमाया। फिर बेला, फिर घुमाया।
“थोड़ा बेलो, थोड़ा घुमाओ। थोड़ा बेलो, थोड़ा घुमाओ।”
रोटी धीरे-धीरे फैलती गई। किनारे गोल होते गए, बिलकुल चाँद की तरह।
तभी नानी अंदर आईं। “अरे! यह चाँद किसने बनाया?”
“मैंने!” मीनू ने कहा।
नानी ने रोटी तवे पर रखी, क्योंकि चूल्हा बच्चों के छूने की चीज़ नहीं थी। तवा गरम था। रोटी पर छोटे-छोटे भूरे धब्बे उभरे। फिर वह फूलने लगी, और फूलती गई, गुब्बारे जैसी।
“फुस्स!” रोटी बैठ गई।
रसोई में गरम आटे की महक भर गई। मोती कटोरे में दूध चप-चप पी रही थी। मीनू ने अपनी गोल रोटी पर फूँक मारी और उसकी भाप को हवा में उड़ते देखा।