भावनाएंहिन्दी
मीनू की लालटेन
“मम्मी, मैं यहीं खड़ी रहूँगी,” मीनू ने धीरे से कहा।
वह आज ही नए घर में आई थी। छत पर बगीचा था, और रस्सी पर रंगीन लालटेनें टँगी थीं। कुछ बच्चे खेल रहे थे। मीनू मम्मी के पीछे छिप गई। उसके हाथ में कागज़ की एक छोटी लालटेन थी, जो उसने खुद बनाई थी। उसे लग रहा था कि अगर उसकी लालटेन भी रस्सी पर टँग जाए, तो यह जगह थोड़ी-सी उसकी हो जाएगी।
पर रस्सी बहुत ऊँची थी।
मीनू पंजों के बल खड़ी हुई। हाथ ऊपर किया। नहीं पहुँची। “एक कदम, फिर एक कदम,” उसने मन में कहा। वह एक छोटा स्टूल खींच लाई। स्टूल पर चढ़ते ही वह चूँ-चूँ करके डगमगाया। मीनू झट से नीचे उतर आई।
पास ही एक गमले के सामने राजू बैठा था। “श्श्श,” उसने कहा। “मैं रात की रानी का इंतज़ार कर रहा हूँ। वह सात बजे खिलती है।”
राजू ने उसकी मदद नहीं की। वह बस फूल को देखता रहा। मीनू भी चुपचाप उसके पास बैठ गई। उसने देखा कि गुलाबी फूल खुले हुए थे, पीले फूल आधे खुले थे, और सफ़ेद कली अभी बंद थी। सबका अपना-अपना समय था।
तभी उसकी नज़र दीवार से टिकी एक लंबी बाँस की छड़ी पर पड़ी। उसके सिरे पर एक हुक लगा था।
मीनू ने लालटेन की डोरी हुक में फँसाई और छड़ी को धीरे-धीरे ऊपर उठाया। लालटेन झूलती हुई रस्सी तक पहुँची। ठक! वह एक और लालटेन से टकरा गई। दोनों लालटेनें हिलने लगीं।
राजू ने मुड़कर देखा। ठीक उसी पल सफ़ेद कली पट! से खुल गई।
“अरे!” दोनों एक साथ बोले, और दोनों हँस पड़े।
ऊपर मीनू की लालटेन जल उठी। उसकी पीली रोशनी दोनों के गालों पर गरम-गरम पड़ रही थी, और रात की रानी की महक चारों ओर फैल रही थी।