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भावनाएंहिन्दी

जब बहुत गुस्सा आता है — सोने से पहले की एक कहानी

तिन्नू का घर नदी किनारे था, और पूरे गाँव में अकेला वही हर पत्थर को नाम से बुलाता था।

"आओ, गोलू। आओ, चपटी रानी।" वह पत्थर उठाता और एक के ऊपर एक रखता जाता। आज उसे अपने से भी ऊँची मीनार बनानी थी। ऊपर बेंत की डालें झूल रही थीं और नीचे चिकने पत्थर धूप में चमक रहे थे।

मीनार कमर तक पहुँची। फिर सीने तक। तभी उसकी बहन पिंकी आ गई।

"आख़िरी पत्थर मैं रखूँगी!"

"नहीं! मेरी बारी है। मीनार मेरी है!"

पिंकी ने हाथ बढ़ाया। तिन्नू ने झट से उसका हाथ हटाया। खट! मीनार हिली। फिर धड़ाम! सारे पत्थर लुढ़क गए।

तिन्नू का चेहरा गरम हो गया। पेट में जैसे आग जल उठी। गुस्सा आया, धम-धम-धम!

"तुमने गिरा दी! जाओ यहाँ से!"

पिंकी का होंठ काँपा। "अम्मा ने खाने के लिए बुलाया है," उसने धीरे से कहा, और चली गई।

तिन्नू ने पत्थर पर लात मारी। पैर में दर्द हुआ, गुस्सा नहीं गया। उसने जल्दी-जल्दी मीनार बनानी चाही, पर हाथ काँप रहे थे। पत्थर फिर गिर गए। गुस्सा आया, धम-धम-धम!

उसने गोलू को उठाया और पूरे ज़ोर से नदी में फेंक दिया। छपाक!

पानी में गोल-गोल लहरें बनीं। बड़ी हुईं, और बड़ी हुईं, फिर धीरे-धीरे चिकनी हो गईं। तिन्नू देखता रहा।

उसने गरम दूध पर फूँकने जैसी एक लंबी साँस छोड़ी। फिर एक और। पेट की आग छोटी होती गई, छोटी, और छोटी।

"गोलू तो पानी में चला गया," वह बुदबुदाया। फिर हल्के से हँस पड़ा। "वह तो अब मछलियों को नाम बताएगा।"

पीछे से पत्तों की सरसराहट हुई। पिंकी एक चपटा पत्थर लिए खड़ी थी।

"पहले तुम रखो, फिर मैं," तिन्नू ने कहा।

पहला पत्थर खट से बैठा। फिर दूसरा। बेंत की डालें हिलती रहीं, और नदी कल-कल करती रही।