भावनाएंहिन्दी
मीता और नानी का दरवाज़ा
सीढ़ियों के नीचे एक छोटा-सा दरवाज़ा था, और आज उसके पीछे आँगन नहीं, रसोई थी!
मीता को यह अजीब नहीं लगा। उस घर का दरवाज़ा हमेशा उसी कमरे में खुलता था, जहाँ सबसे पहले झाड़ू लगी हो। पर आज मीता को रसोई नहीं चाहिए थी। उसे नानी का कमरा चाहिए था।
नानी अपने गाँव लौट गई थीं। मीता को उनकी बहुत याद आ रही थी। उसने सोचा, "बस एक बार नानी का कमरा देख लूँ।"
उसने दरवाज़ा बंद किया और आँखें कसकर मींच लीं। फिर खोला। चर्र! अब भी रसोई थी। माँ वहाँ झाड़ू लगा रही थीं।
"मीता, ज़रा हटो। यहाँ धूल उड़ेगी।"
मीता ने फिर कोशिश की। इस बार उसने दरवाज़े से धीरे से कहा, "प्लीज़, नानी का कमरा।" पर दरवाज़ा नहीं माना। रसोई ही रही।
मीता बैठ गई। फिर उसने कोने में रखी अपनी छोटी झाड़ू को देखा। वह उछलकर खड़ी हो गई।
वह दौड़कर नानी के कमरे में गई। वहाँ खाट थी, खिड़की थी, और कोने में सूखी धूल थी। मीता ने झाड़ू उठाई।
शश-शश, झाड़ू चली। शश-शश, झाड़ू चली।
धूल उड़ी और मीता को ज़ोर की छींक आई। "आँछी!" झाड़ू भी हँसकर लुढ़क गई।
फिर मीता भागकर दरवाज़े तक आई और उसे खोला। चर्र!
सामने नानी का कमरा था। खिड़की से धूप आ रही थी। खाट पर नानी की पीली शॉल रखी थी।
नानी वहाँ नहीं थीं। मीता यह देखकर थोड़ी देर चुप रही। फिर वह अंदर गई और शॉल उठाकर अपने कंधों पर ओढ़ ली। उसमें नारियल के तेल और इलायची की महक थी।
मीता ने शॉल में अपनी नाक छिपा ली। शॉल नानी की गोद जितनी ही गरम थी। बाहर माँ की झाड़ू अब भी चल रही थी, शश-शश, शश-शश।