नए अनुभवहिन्दी
मीतू और मीठे आम
आम के बाग में पके आमों की महक भरी थी।
मीतू पेड़ के नीचे खड़ी होकर नाक से सूँघ रही थी। सुबह उसने नानी से वादा किया था, "नानी, दोपहर को हम दोनों मीठे आम खाएँगे। मैं आम लाऊँगी!" नानी थाली और छुरी लेने घर के अंदर गई थीं।
मीतू को मीठे आम बहुत पसंद थे। पीले, रस भरे, मीठे-मीठे आम।
सबसे पीले आम सबसे ऊँची डाल पर लटके थे, जैसे छोटे-छोटे सूरज।
मीतू कूदी। हाथ बहुत नीचे रह गया। वह फिर कूदी, फिर भी आम दूर रहे।
"अब डंडी से तोड़ती हूँ," उसने कहा। उसने लंबी डंडी ऊपर बढ़ाई। डंडी आम तक पहुँची ही नहीं।
ऊपर की डाल पर एक तोता बैठा था। वह अपना आम खाने में मगन था और मीतू की तरफ़ देख भी नहीं रहा था। "टें-टें!" उसने कहा, और गुठली टप से मीतू के सिर पर गिरा दी।
"अरे!" मीतू हँस पड़ी। फिर उसका मुँह उतर गया। "मैंने तो वादा किया था।"
तभी पास रखी पुरानी कुर्सी चरर-चरर करने लगी। नानी सुबह उस पर बैठी थीं, इसलिए वह अपने आप झूल रही थी, आगे-पीछे, आगे-पीछे। इस बाग में इस बात पर कोई हैरान नहीं होता था।
मीतू ने झूलती कुर्सी को देखा। फिर पेड़ के मोटे तने को देखा।
"अगर कुर्सी तने से टकराए तो?"
उसने कुर्सी को तने के बिल्कुल पास सरका दिया। कुर्सी आगे गई। ठक! पीछे आई। फिर आगे गई। ठक! पत्ते सरसराने लगे। तोता चिल्लाया, "टें-टें-टें!"
ठक! ठक! ठक!
फिर ऊपर से धप्प! एक पीला आम मीतू की गोद में आ गिरा। धप्प! दूसरा आम घास पर लुढ़कता गया।
"दो आम! एक मेरा, एक नानी का!"
नानी थाली लेकर आ गईं। उन्होंने आम काटे। मीतू ने बड़ा-सा टुकड़ा मुँह में रखा। रस ठुड्डी से टपका, कोहनी से भी टपका।
"मीठा, मीठा, मीठा!" मीतू बोली।
नानी हँसीं, "सच में, मीठा, मीठा, मीठा!"
ऊपर तोता अपने आम में लगा रहा। पास में कुर्सी धीरे-धीरे झूलती रही, आगे-पीछे, आगे-पीछे, और मीतू की उँगलियाँ चिपचिप करती रहीं।