समुदाय के सहायकहिन्दी
मीनू और डाकिया काका की घंटी
मीनू ऐसी लड़की थी जो रोज़ सुबह मुर्गे से भी पहले उठ जाती थी, क्योंकि उसे डाकिया काका का इंतज़ार रहता था। आज उसके पास नानी के लिए एक चित्र था। उसमें लाल सूरज था और पीली गाय थी। मीनू चाहती थी कि काका उसे नानी तक पहुँचा दें।
आँगन में सब जाग चुके थे। गाय रंभा रही थी और मुर्गियाँ दाना चुग रही थीं। तभी दूर से आवाज़ आई, “ट्रिन-ट्रिन! डाकिया आया!”
मीनू चित्र लेने दौड़ी। पर चित्र तो भूसे वाली कोठरी में रखा था, और कोठरी का कोना बहुत अँधेरा था। मीनू दरवाज़े पर रुक गई।
“ट्रिन-ट्रिन! डाकिया आया!” घंटी अब और पास थी।
मीनू ने भूरी मुर्गी से कहा, “चलो ना, मेरे साथ चलो।”
“कुड़-कुड़!” मुर्गी बोली और अपने अंडे देखने चली गई। उसे अपना काम था।
मीनू ने आँखें बंद कीं और एक कदम आगे बढ़ाया। पर अँधेरे में उसे कुछ नहीं दिखा, और वह फिर पीछे हट गई। तब उसने आँखें खोलकर ध्यान से देखा। दीवार की एक झिरी से, यानी पतली-सी दरार से, धूप की एक लकीर अंदर आ रही थी। वह सुनहरे धागे जैसी लग रही थी।
“अरे! इसे पकड़कर चलती हूँ,” मीनू ने कहा।
वह धूप की लकीर के साथ-साथ चली। लकीर के आख़िरी छोर पर उसका चित्र पड़ा था, जैसे वह उसी का इंतज़ार कर रहा हो।
मीनू चित्र लेकर फाटक की ओर भागी। काका अपनी साइकिल मोड़ चुके थे। “रुकिए, काका!” वह चिल्लाई। फिर उसने झट से साइकिल की घंटी दबा दी। “ट्रिन-ट्रिन!”
काका हँस पड़े। “अरे वाह! आज डाकिए को किसने बुला लिया?”
मीनू ने चित्र आगे बढ़ा दिया। “यह नानी के लिए है।”
“बहुत सुंदर है,” काका ने कहा। “और लो, यह चिट्ठी तुम्हारे लिए है। नानी ने भेजी है।”
मीनू ने चिट्ठी दोनों हाथों में पकड़ ली। साइकिल की घंटी धीरे-धीरे दूर होती गई, ट्रिन-ट्रिन, ट्रिन-ट्रिन। मीनू के गालों पर सुबह की धूप गरम-गरम पड़ रही थी।