सामग्री पर जाएँ

समुदाय के सहायकहिन्दी

गुनगुनाती दमकल गाड़ी लाली

लाली एक लाल दमकल गाड़ी थी, और उसकी घंटी बजती नहीं थी, गुनगुनाती थी। टन-टन की जगह वह "ऊँ-ऊँ-ऊँ" करती थी।

लाली को एक ही काम सबसे अच्छा लगता था। आग बुझाना।

एक सुबह गली के आखिर में सूखे पत्तों के ढेर में आग लग गई। आग छोटी थी, पर पास ही एक खिड़की पर गमलों का बगीचा था। बड़े गमले, छोटे गमले, और एक टूटी बाल्टी में भी पौधा।

"मैं अभी बुझाती हूँ!" लाली ने कहा और दौड़ पड़ी।

उसने पाइप खोला। फुस्स! बस दो बूँदें निकलीं।

लाली ने पाइप को हिलाया। पानी नहीं आया। उसने बटन दबाया। फिर भी नहीं। उसने ज़ोर से गुनगुनाया, "ऊँ-ऊँ-ऊँ!" पाइप से फिर वही फुस्स।

"अरे, पानी क्यों नहीं आ रहा?" लाली घबरा गई। उस मोहल्ले में सब भूल चुके थे कि पानी गिनती से चलता है।

तभी खिड़की पर मुन्नी आई। वह अपने गमलों को पानी दे रही थी। उसे आग दिखी ही नहीं, वह तो बस अपने पौधों में लगी थी।

"एक," मुन्नी ने कहा, और उसकी झारी से पानी की धार निकली।

"दो!" धार थोड़ी ऊँची उठी।

"तीन! चार!" पानी फव्वारे की तरह उछला।

लाली ने आँखें बड़ी कर लीं। "गिनती से पानी ऊँचा जाता है!"

उसने पाइप को पत्तों की तरफ किया। "एक," उसने धीरे से कहा। पाइप से धार निकली। "दो! तीन! चार!"

छप-छप-छप! पानी बारिश की तरह पत्तों पर गिरा। आग फुस्स करके सो गई।

धुआँ पतला होकर हवा में घुल गया। गीले पत्तों से बूँदें टपक रही थीं। खिड़की पर मुन्नी अब भी गिन रही थी, "नौ... दस..."

लाली वहीं खड़ी रही और धीरे-धीरे गुनगुनाती रही, "ऊँ-ऊँ-ऊँ।"