शरीर और इंद्रियांहिन्दी
मीनू की छींक
मीनू को छुपम-छुपाई में जीतना था, इस बार भैया से ज़रूर।
भैया गोलू दीवार की तरफ़ मुँह करके गिन रहा था, "एक, दो, तीन…" मीनू भागकर बड़ी अलमारी में घुस गई। अंदर दादी की पुरानी ऊनी शॉल रखी थी। मीनू उसके पीछे दुबककर बैठ गई।
तभी उसकी नाक में गुदगुदी हुई। गुदगुदी, गुदगुदी। छींक आ रही थी, और बहुत ज़ोर की।
"नहीं, अभी नहीं," मीनू ने फुसफुसाकर कहा।
उसने नाक को उँगली से दबाया। गुदगुदी नहीं गई। फिर उसने साँस रोक ली। गाल फूल गए, चेहरा लाल हो गया। गुदगुदी, गुदगुदी।
बाहर से गोलू की आवाज़ आई, "आ रहा हूँ मैं!"
शॉल के नीचे कुछ हिला। मिठ्ठू बिल्ली निकल आई। वह रोज़ दोपहर यहीं सोती थी, यह उसकी गरम जगह थी। उसने मीनू को देखा, आँखें झपकाईं और शॉल पर गोल होकर बैठ गई।
मीनू ने देखा कि शॉल से रोएँ उड़ रहे हैं। छोटे-छोटे, हल्के रोएँ, ठीक सफ़ेद फुहार जैसे। वही उसकी नाक के आगे नाच रहे थे।
तब मीनू को एक बात सूझी। उसने शॉल का कोना उठाया और अपना पूरा चेहरा उसमें छिपा लिया।
"आऽऽ-छीं!"
छींक शॉल में घुस गई और बाहर आई सिर्फ़ "फुस्स!" की आवाज़ बनकर। पर शॉल से रोएँ फूलकर उड़ गए, पूरी अलमारी में। मिठ्ठू की मूँछों पर भी बैठ गए। मिठ्ठू ने नाक सिकोड़ी, "म्याऊँ-छीं!"
मीनू अपनी हँसी दबाने लगी।
अलमारी के बाहर गोलू के क़दम आए। वे रुके। मीनू ने साँस थाम ली।
"यहाँ तो सिर्फ़ मिठ्ठू है," गोलू बोला। क़दम आगे चले गए।
मीनू ने धीरे से शॉल से सिर निकाला। मिठ्ठू गुर्र-गुर्र करने लगी। एक नरम रोआँ हवा में घूमता हुआ नीचे उतरा और मीनू की नाक पर आकर बैठ गया।