शरीर और इंद्रियांहिन्दी
मीतू की नाक बहुत ख़ास थी। वह बारिश को आने से पहले सूँघ लेती थी।
एक दोपहर उसने आँगन में हवा सूँघी और दौड़कर बोली, “नानी, बारिश आ रही है!”
नानी खाट पर लेटी थीं। उनकी नाक बंद थी। “मुझे तो कुछ सूझता ही नहीं,” वे बोलीं। “काश, मिट्टी की सोंधी खुशबू आ जाए। तब मेरा मन ठीक हो जाए।”
मीतू के पास एक छोटा डिब्बा था। “मैं खुशबू को डिब्बे में भर लाऊँगी,” उसने कहा।
पहले उसने आँगन में डिब्बा खोला और झट से ढक्कन बंद कर दिया। नानी ने सूँघा। “इसमें तो बस हवा है, बिटिया।”
फिर मीतू ने क्यारी की गीली मिट्टी डिब्बे में भरी। नानी ने सूँघा। “यह तो कीचड़ है।”
मीतू बरामदे में बैठ गई। बाहर पहली बूँदें गिरने लगीं। टप, टप। उसने ध्यान से देखा। जहाँ सूखी धूल थी, वहीं बूँद गिरते ही सोंधी खुशबू उठती थी।
“अच्छा! खुशबू सूखी मिट्टी में सोई रहती है,” मीतू बोली। “बूँद उसे जगाती है!”
उसने डिब्बा खोलकर सूखी धूल के पास रख दिया। टप, टप। खुशबू उठने लगी। मीतू ढक्कन बंद करने ही वाली थी कि छपाक! डिब्बे में कुछ कूद पड़ा।
एक हरा मेंढक था! वह डिब्बे में बैठकर बोला, “टर्र!”
मीतू हँस पड़ी। “तुम्हारा घर तालाब है, डिब्बा नहीं। तुम तो बारिश में गाना गाने निकले हो न?”
मेंढक फिर उछला और पोखर की ओर चला गया। “टर्र, टर्र।”
अब मीतू ने जल्दी से ढक्कन बंद किया और डिब्बा नानी के पास ले गई।
नानी ने ढक्कन उठाया। सोंधी, सोंधी खुशबू पूरे कमरे में फैल गई। छत पर बूँदें टप, टप बज रही थीं।
नानी ने लंबी साँस ली और मुस्कुराईं। मीतू ने भी आँखें बंद कर लीं।