शरीर और इंद्रियांहिन्दी
स्पेशल कंबल
बारिश के बाद घर का आँगन गीला और चमकदार था।
टीनू वहाँ अपना पीला कंबल लेकर खड़ी थी। कंबल के कोने पर एक छोटा-सा तारा बना था। उसके बिना टीनू को नींद नहीं आती थी। आज रात भी उसे वही कंबल चाहिए था।
तभी कंबल उसके हाथ से छूटा और छपाक! सीधा पानी के गड्ढे में जा गिरा।
“अरे!” टीनू ने कंबल उठाया। वह भारी था और उससे टप-टप पानी गिर रहा था।
उसने कंबल को खूब निचोड़ा, पर वह फिर भी गीला रहा। फिर उसने उसे रस्सी पर डाल दिया। कंबल लटक गया और टप-टप करता रहा।
“शाम तक नहीं सूखा, तो मैं क्या ओढ़ूँगी?” टीनू ने धीरे से कहा।
एक गौरैया आँगन में उतरी। उसे नहाना था, इसलिए वह सीधे गड्ढे में कूदी। धम-धम, धम-धम! गड्ढा ढोल की तरह बज उठा और गौरैया फुर्र से ऊपर उछल गई। फिर वह पंख फड़फड़ाकर बैठी और बोली, “चीं!”
टीनू हँस पड़ी। इस गाँव में गड्ढे हमेशा ऐसे ही बजते थे, पर आज उसने ध्यान से देखा। जब गड्ढा उछला, तो सारा पानी बूँदें बनकर उड़ गया।
टीनू को एक बात सूझी। उसने कंबल को दोनों कोनों से पकड़ा और गड्ढे के पास खड़ी हो गई। फिर वह कूदी। धम-धम, धम-धम!
कंबल हवा में फटफट उड़ा, और बूँदें चारों ओर छिटक गईं। टीनू कूदती रही, कंबल फटफटाता रहा। गौरैया भी चीं-चीं करती रही।
फिर बादल हट गए और धूप आँगन में उतर आई। टीनू ने कंबल रस्सी पर फैला दिया।
शाम को उसने कंबल को छुआ। वह गरम था और उसमें धूप की खुशबू थी। टीनू उसमें लिपट गई। बाहर गड्ढा अब भी हल्के से बज रहा था: धम… धम… धम…