शरीर और इंद्रियांहिन्दी
मीनू की आधी पिचकारी
"मेरी पिचकारी कहाँ है?" मीनू ने बक्सा खोलते हुए पूछा।
आज होली थी। मीनू को सबसे पहले दादी को गुलाबी रंग लगाना था। दादी आँगन में बैठी गुजिया की थाली सजा रही थीं।
बक्से में लाल पिचकारी की टंकी मिली, पर उसका डंडा नहीं था। बस आधी पिचकारी थी।
मीनू ने टंकी में रंग भरा और उसे उलटा किया। टप, टप, टप। बस कुछ बूँदें गिरीं।
"ऐसे तो दादी तक रंग नहीं पहुँचेगा," उसने कहा।
फिर उसने टंकी को दबाया। वह सख़्त थी, ज़रा भी नहीं दबी।
तभी बक्से के कोने में उसे एक पीली छोटी पिचकारी दिखी। उसकी टंकी टूटी थी, पर डंडा ठीक था। मीनू हँस पड़ी। "लाल की टंकी, पीले का डंडा!"
उसने पीला डंडा लाल टंकी में डाला और ज़ोर से धक्का दिया। फुस्स! रंग पीछे से निकला और सीधे उसकी नाक पर लगा।
"अरे मीनू, यह क्या हुआ?" दादी ने हँसकर पूछा।
"डंडा पतला है, दादी। टंकी में ढीला घूम रहा है," मीनू ने नाक पोंछते हुए कहा। उसने डंडे को ध्यान से देखा। फिर उसे अपनी सिर की पुरानी रिबन याद आई।
उसने रिबन डंडे के सिरे पर कसकर लपेटी। फिर डंडा टंकी में डाला। इस बार वह चिपककर बैठ गया, न ढीला, न टेढ़ा।
मीनू ने गुलाबी रंग भरा। वह दादी के सामने खड़ी हुई।
"पिच-पिच, रंग निकल!" उसने कहा और डंडा दबाया।
पिच-पिच! गुलाबी धार सीधी गई और दादी की सफ़ेद शॉल पर फूल की तरह खिल गई।
"अरे बाप रे!" दादी हँस पड़ीं।
मीनू भी हँसी। गुलाबी बूँदें दादी की नाक से टपक रही थीं, और गुजिया की थाली से मीठी ख़ुशबू उड़ रही थी।