शरीर और इंद्रियांहिन्दी
बिट्टू और गाने वाला फाटक
बिट्टू एक पैर पर कूदता हुआ आँगन में दौड़ रहा था। सुबह की धूप अभी-अभी खेत पर उतरी थी। मुर्गा बोल चुका था, गाय उठ चुकी थी, और आँगन का फाटक अपनी रोज़ की धुन गा रहा था, “चूँ-चूँ-ची, चूँ-चूँ-ची।”
पर बिट्टू का ध्यान धुन पर नहीं था। उसके पेट में गुड़-गुड़ हो रही थी। उसे पॉटी आई थी। आज वह अपनी छोटी लाल पॉटी-सीट पर बैठना चाहता था, बड़े बच्चों की तरह।
लाल पॉटी भूसे वाले कोने में रखी थी। उसके सामने अनाज का बोरा रखा था।
बिट्टू ने बोरे को धक्का दिया। बोरा नहीं हिला। उसने कंधे से धक्का दिया। फिर भी नहीं हिला। बोरा हाथी जितना भारी लग रहा था।
“मैं खुद कर लूँगा,” बिट्टू ने कहा। कल उसने दादी से यही कहा था। अब दादी को बुलाना मुश्किल लग रहा था।
उसने बोरे के नीचे हाथ डाला और पॉटी को खींचा। पॉटी ज़रा-सी सरकी और अटक गई। बिट्टू ने घुटने भींच लिए। जल्दी, जल्दी!
तभी फाटक ने फिर गाया, “चूँ-चूँ-ची!” बिट्टू ने मुड़कर देखा। दादी अंदर आ रही थीं। वे मुर्गियों को दाना डालने आई थीं।
बिट्टू ने सोचा, “एक आदमी से नहीं हिलता। दो से शायद हिल जाए।”
“दादी!” वह चिल्लाया। “मुझसे अकेले नहीं हो रहा। मेरी मदद करो!”
दादी ने बाल्टी रख दी। “अच्छा! तुम इधर से पकड़ो, मैं उधर से। बोलो, एक, दो, तीन, ज़ोर लगा के!”
“एक, दो, तीन, ज़ोर लगा के!”
बोरा घर्र से सरक गया। लाल पॉटी सामने थी।
बिट्टू भागकर बैठ गया। उसके पीछे दादी बोरा उठाए मुर्गियों की तरफ चल दीं और गुनगुनाने लगीं। मुर्गियाँ कुड़-कुड़ करती दौड़ी आईं।
कुछ देर में टप-टप की आवाज़ आई। बिट्टू मुस्कुराया। पीठ पर धूप गुनगुनी लग रही थी। और फाटक फिर गाने लगा, “चूँ-चूँ-ची, चूँ-चूँ-ची।”