शरीर और इंद्रियांहिन्दी
मीनू और गुनगुनाता पुल
“मेरा ब्रश कहाँ है?” मीनू ने पूछा।
रात हो गई थी। मीनू को दाँत साफ़ करके सोना था। पेस्ट शेल्फ़ पर रखा था। कप भी रखा था। बस ब्रश नहीं था।
“ब्रश, ब्रश, कहाँ है ब्रश?” वह गुनगुनाई।
उसने पलंग के नीचे देखा। वहाँ सिर्फ़ एक मोज़ा मिला। उसने तकिये के पीछे देखा। वहाँ कुछ नहीं था।
उसकी बिल्ली मोती दरवाज़े पर बैठी थी। वह ब्रश नहीं ढूँढ रही थी। वह खिड़की के बाहर उड़ते जुगनू को देख रही थी। “म्याऊँ,” उसने कहा और पूँछ हिलाई।
मीनू ने काग़ज़ पर नक्शा बनाया, दिन में वह जहाँ-जहाँ गई थी। रसोई, बग़ीचा, पुल। पर नक्शा गड़बड़ निकला। पुल बग़ीचे के अंदर बन गया और रसोई नदी में। मीनू हँस पड़ी। “यह तो उलटा नक्शा है, मोती!”
फिर वह रुकी। नक्शे में पुल तो था। उसे याद आया कि दोपहर में उसने पुल पर रेत का केक बनाया था। शायद ब्रश से रेत हिलाई थी।
मीनू ने चप्पल पहनी और टॉर्च उठाई। घर के आगे छोटा-सा पुल था। उस पर हर कदम पर अलग सुर निकलता था। टिन, टोन, टुन। यह सबको पता था, कोई इस पर हैरान नहीं होता था।
मीनू चली। टिन, टोन, टुन। टिन, टोन, टुन।
फिर एक तख़्ते पर अजीब आवाज़ आई। “टक!”
सुर तो निकला ही नहीं। मीनू झुकी और टॉर्च की रोशनी डाली। दो तख़्तों के बीच कुछ फँसा था। उसका नीला ब्रश!
उसने ब्रश खींचकर निकाला। तभी मोती जुगनू के पीछे कूदी। “टुन्न!” पुल ज़ोर से बजा, और मीनू खिलखिला पड़ी।
घर लौटकर मीनू ने ब्रश धोया। पेस्ट लगाया। ऊपर-नीचे, गोल-गोल। आगे के दाँत, पीछे के दाँत। मुँह में झाग भर गया। फिर उसने कुल्ला किया।
“अब सोने चलें,” मीनू ने कहा।
वह रज़ाई में घुसी। मोती पैरों के पास गोल हो गई। बाहर पुल पर कोई जुगनू-सा हल्का क़दम पड़ा, और बहुत धीमा सुर आया। टिन… टोन… टुन…