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साहस और डरहिन्दी

लल्लू की खोज

“मेरा लल्लू कहाँ है?” मीनू ने तकिया उठाकर पूछा।

लल्लू उसका नरम सफ़ेद खरगोश था। उसके बिना मीनू को नींद नहीं आती थी। और आज रात बाहर बादल भी बोल रहे थे। गड़-गड़-गड़!

पापा कमरे में आए। “शाम को तुम उसे बगीचे में ले गई थीं, याद है?”

मीनू को याद आ गया। लल्लू बगीचे वाले छोटे कमरे में रह गया था, जहाँ रंग-बिरंगे गमले रखे थे।

पापा ने टॉर्च दी। वे दरवाज़े पर खड़े रहे, क्योंकि उन्हें अपनी चप्पल ढूँढ़नी थी। मीनू अकेली अंदर गई।

उसने मेज़ के नीचे देखा। लल्लू नहीं था। उसने बोरी के पीछे देखा। वहाँ भी नहीं।

बादल फिर बोले। गड़-गड़-गड़!

तभी मीनू ने कुछ सुना। एक गमला भी बोल रहा था, बहुत धीरे से। घुर्र-घुर्र-घुर्र!

“बादल गड़-गड़, गमला घुर्र-घुर्र,” मीनू ने हँसकर कहा। “कोई बात नहीं।”

वह आवाज़ के पीछे-पीछे गई। सबसे बड़े नीले गमले में टॉर्च की रोशनी पड़ी। अंदर एक छोटा-सा साही गोल होकर बैठा था। बारिश से बचने के लिए वह यहाँ आया था। उसके काँटों के पास लल्लू का एक कान दिख रहा था।

“अरे! वह तो मेरा लल्लू है!” मीनू ने कहा।

साही ने नाक उठाई। उसे लल्लू बहुत नरम लगा था, इसलिए उसने उसे अपना बिस्तर बना लिया था। वह जाना नहीं चाहता था।

मीनू ने सोचा। फिर उसने अपना गुलाबी मफ़लर उतारा और गमले में रख दिया। “लो, यह भी नरम है।”

साही ने मफ़लर सूँघा। वह धीरे से उस पर सरक गया। मीनू ने लल्लू को उठा लिया।

“मिल गया!” मीनू ने पापा को दिखाया।

फिर वह बिस्तर में लौटी। बाहर बादल दूर जाकर धीमे-धीमे बोल रहे थे। लल्लू उसकी बाँहों में गरम था। और बगीचे से हल्की-सी आवाज़ आ रही थी, घुर्र... घुर्र... घुर्र...