साहस और डरहिन्दी
मीनू और लुढ़कती टॉर्च
मीनू को रात में पानी पीना था, पर कमरे में बहुत अंधेरा था।
उसने तकिये के पास से अपनी छोटी टॉर्च उठाई। टॉर्च हाथ से फिसल गई और लुढ़कने लगी। लुढ़क, लुढ़क, लुढ़क। वह खाट के नीचे चली गई।
मीनू झुकी और हाथ बढ़ाया। टॉर्च थोड़ा-सा आगे लुढ़क गई।
"अरे, रुको!" मीनू ने कहा। उसने फिर हाथ बढ़ाया। टॉर्च फिर थोड़ा-सा आगे लुढ़क गई।
मीनू ने सोचा, "अम्मा को जगा दूँ?" पर अम्मा गहरी नींद में थीं। तब उसने आँखें कसकर बंद कर लीं। "आँखें बंद, तो अंधेरा नहीं दिखेगा।" पर आँखें बंद करने से अंधेरा और बड़ा लगा।
तभी पास से आवाज़ आई, "म्याऊँ!"
मीनू उछल पड़ी। पर वह तो बिल्ली मोती थी। मोती अपने दूध के कटोरे के पास जा रही थी। उसे मीनू की टॉर्च से कोई मतलब नहीं था। वह पूँछ हिलाकर आगे चली गई।
मीनू ने आँखें खोलीं। अब उसने कुछ नया देखा। खिड़की से चाँद की रोशनी आ रही थी, और फर्श पर एक सफ़ेद चौकोर टुकड़ा बना था।
टॉर्च लुढ़कते-लुढ़कते उसी सफ़ेद टुकड़े में आकर रुक गई। वहाँ वह साफ़ दिख रही थी।
मीनू ने टॉर्च उठाई और बटन दबाया। टिक! गोल-सी पीली रोशनी फैल गई।
अब मीनू को मटका भी दिखा। उसके पास थोड़ा पानी गिरा हुआ था। मीनू का पैर उस पर पड़ा।
ढम!
पानी का छोटा तालाब ढोल की तरह बज उठा। मोती डर के मारे कटोरे से दो कदम पीछे कूदी। मीनू खिलखिलाकर हँस पड़ी।
उसने गिलास भरा और पानी पिया, गट-गट। मोती फिर दूध पीने लगी, चप-चप। खिड़की से चाँद का सफ़ेद टुकड़ा फर्श पर चुपचाप टिका रहा, और मीनू के पैर के नीचे पानी धीरे से बोला, "ढम, ढम।"