साहस और डरहिन्दी
तारा की लालटेन
तारा एक छोटी खोजकर्ता थी, और उसकी लालटेन ऐसी थी कि जब भी कोई पास में हँसता, वह और तेज़ चमकने लगती।
एक सुबह तारा बंदरगाह पर गई। वहाँ छोटी-छोटी नावें पानी पर हिल रही थीं। तारा को नावों वाले पुराने घर में छिपा सुनहरा शंख ढूँढना था। उसने दरवाज़ा खोला और अंदर चली गई।
खट! दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया।
तारा ने धक्का दिया। दरवाज़ा नहीं खुला। उसने खींचा। फिर भी नहीं खुला। यह दरवाज़ा तो बस बाहर से खुलता था।
“कोई है?” तारा ने पुकारा।
कोई नहीं बोला। अंदर अँधेरा था, और लालटेन की रोशनी बहुत धीमी थी।
तारा ने सोचा, “कुछ और करके देखती हूँ।” उसने दीवार टटोली। वहाँ बस रस्सियाँ और जाल थे।
तभी अलमारी के नीचे से एक केकड़ा निकला। वह टेढ़ा-टेढ़ा चल रहा था, और उसके मुँह में रोटी का एक टुकड़ा था। वह तारा को देखे बिना सीधा चला, फिर अपने ही पैरों में उलझ गया। लुढ़क-लुढ़क, और छप! वह पानी की बाल्टी में जा गिरा।
तारा हँस पड़ी। “अरे केकड़े भैया!”
केकड़े ने बाल्टी से अपना चिमटा निकाला और रोटी को कसकर पकड़ लिया। उसे बस अपना खाना चाहिए था।
और लालटेन? वह एकदम चमक उठी!
उसकी रोशनी में तारा ने ऊपर देखा। छत में एक छोटा सा दरवाज़ा था, और वहाँ तक एक सीढ़ी जा रही थी। उसके पास ही अलमारी पर सुनहरा शंख रखा था।
तारा ने शंख उठाया और एक-एक सीढ़ी चढ़ी। ऊपर पहुँचकर उसने दोनों हाथों से ज़ोर लगाया। दरवाज़ा खुल गया।
बाहर धूप थी। तारा छत पर बैठ गई। नीचे नावें पानी पर हिल रही थीं, ठक-ठक, ठक-ठक। उसने शंख कान से लगाया, तो उसमें समुद्र की धीमी-धीमी आवाज़ आ रही थी। उसकी लालटेन उसके पास गरम-गरम चमक रही थी।