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ऋतुएं और मौसमहिन्दी

मीनू की पतंग बादल के पास

मीनू को गिनती करना इतना पसंद था कि वह सीढ़ियाँ भी गिनकर चढ़ती थी। एक, दो, तीन… बारह सीढ़ियाँ, और फिर छत।

आज छत पर अच्छी हवा चल रही थी। मीनू के हाथ में लाल पतंग थी, जिसकी पूँछ में पीला फीता बँधा था। सुबह उसने दादी से वादा किया था, “शाम से पहले मेरी पतंग बादल को छुएगी।”

सब जानते थे कि पतंग उसी की ऊँची जाती है, जो ज़ोर से गिनती बोलता है। इसमें अजीब कुछ नहीं था।

पर मीनू की पतंग ऊपर गई ही नहीं।

वह दौड़ी। पतंग ज़मीन पर घिसटती रही।

वह पानी की टंकी के पास चढ़कर खड़ी हुई और पतंग ऊपर उछाली। पतंग फर-फर करके नीचे आ गई।

मुंडेर पर एक कौआ बैठा था। वह दादी के सूखते पापड़ देख रहा था। उसे पतंग से कोई मतलब नहीं था। उसने बस एक आँख से मीनू को देखा और बोला, “काँ!”

तभी पड़ोस की छत से चीकू की आवाज़ आई, “एक! दो! तीन!” और उसकी नीली पतंग सर्र से ऊपर चढ़ गई।

मीनू रुक गई। उसने अपने होंठ छुए। वे कसकर बंद थे। वह तो सारी गिनती मन ही मन कर रही थी!

“अरे!” वह हँस पड़ी। उसने पतंग उठाई, डोर कसकर पकड़ी और ज़ोर से बोली, “एक! दो! तीन!”

पतंग ऊपर उठी।

“दस! बीस! तीस!”

पतंग ऊँची और ऊँची चली गई। उसका पीला फीता हवा में लहराया और कौए की नाक को गुदगुदा गया।

“काँ-काँ!” कौआ घबराकर उछला और पापड़ का टुकड़ा मुँह में दबाकर उड़ गया।

“पचास! अस्सी! सौ!”

पतंग एक सफ़ेद बादल के पास पहुँच गई। डोर हाथ में हल्के-हल्के गुनगुना रही थी।

मीनू चुप हो गई। छत पर बस हवा थी, और ऊपर आसमान में उसकी लाल पतंग, बादल के बिल्कुल पास।