ऋतुएं और मौसमहिन्दी
मीनू और गाने वाला फाटक
“मैं आज अपना बीज ज़रूर बोऊँगी!” मीनू ने कहा।
दादी ने उसे एक नन्हा, काला बीज दिया था, बिल्कुल तिल जितना छोटा। मीनू ने उसे हथेली पर रखा और फाटक के पास आँगन में चली गई। वह फाटक हवा से खुलता तो चरर-चूँ नहीं करता था, गुनगुनाता था: “ला-ला-ली, ला-ला-ली।” उस घर में सब जानते थे कि फाटक ऐसे ही गाता है।
मीनू बैठी और मिट्टी खोदने लगी। पर मिट्टी सूखी थी और पत्थर जैसी सख्त। उँगली से खोदा, तो उँगली दुखने लगी।
“अरे, यह तो बहुत कड़ी है,” मीनू बोली।
फिर वह चम्मच ले आई। चम्मच टेढ़ा हो गया, पर गड्ढा नहीं बना।
तभी एक गिलहरी दौड़ती हुई आई। उसे अपना मूँगफली का दाना छिपाना था। वह इधर सूँघती, उधर सूँघती, फिर बोली, “यहाँ तो कुछ भी नहीं खुदता!” और पूँछ हिलाकर भाग गई। वह अपने दाने के लिए जगह ढूँढ रही थी, मीनू की मदद के लिए नहीं आई थी।
मीनू ने ठंडी साँस ली। तभी उसे आवाज़ सुनाई दी: टप… टप… टप…
वह नल के पास गई। नल से पानी की बूँदें गिर रही थीं, और ठीक नीचे की मिट्टी काली और नरम थी।
“अरे वाह!” मीनू हँस पड़ी। “यहाँ की मिट्टी तो गीली है!”
उसने उँगली से मिट्टी दबाई। उँगली अंदर चली गई, जैसे रोटी के आटे में। मीनू ने छोटा-सा गड्ढा बनाया, नन्हा बीज उसमें रखा और ऊपर से मिट्टी ढक दी। फिर हल्के हाथ से थपथपाया।
“सो जाओ, नन्हे बीज,” उसने धीरे से कहा।
हवा चली। फाटक गुनगुनाया, “ला-ला-ली, ला-ला-ली।” नल से एक बूँद गिरी, टप। मीनू वहीं बैठी रही और मिट्टी की ठंडक अपनी उँगलियों पर महसूस करती रही।