जानवर और प्रकृतिहिन्दी
मीतू और भूरू की टोकरी
मीतू दबे पैर बरामदे में चल रही थी। उसके हाथ में एक छोटी टोकरी थी, और टोकरी में नरम कंबल।
ऊपर नीली लालटेन जल रही थी। इस गाँव में सब जानते थे कि लालटेन नीली हो, तो रात को बारिश नहीं होगी।
आज घर में एक नया पिल्ला आया था। भूरा, गोल-मटोल, रुई के गोले जैसा। मीतू ने उसका नाम रखा था भूरू। वह चाहती थी कि भूरू अपनी पहली रात टोकरी में सोए। फिर सुबह वह अम्मा से कहेगी, “देखो, भूरू खुद सो गया!”
मीतू ने भूरू को टोकरी में रखा। “सो जा, भूरू। सो जा।”
भूरू एक पल बैठा। फिर फुदककर बाहर आ गया। “कूँ-कूँ!”
मीतू ने उसे फिर अंदर रखा। “सो जा, भूरू। सो जा।”
भूरू फिर बाहर।
मीतू ने टोकरी में अपनी लाल गेंद रख दी। भूरू ने गेंद मुँह में उठाई और भागा। गेंद लुढ़कती गई, टप-टप-टप, सीढ़ियों से नीचे। भूरू उसके पीछे दौड़ा और धम्म से गिरा। उसका एक कान उलटकर मुँह पर आ गया।
मीतू खिलखिलाकर हँस पड़ी। फिर उसने गोद में उठाकर भूरू को देखा। वह कुछ ढूँढ़ रहा था। उसकी नाक मीतू की पुरानी चप्पल पर जा टिकी। उसने चप्पल को सूँघा, फिर एक बार और सूँघा।
“अच्छा,” मीतू ने धीरे से कहा। “तुझे मेरी खुशबू चाहिए?”
उसने चप्पल उठाई और कंबल के बीच रख दी। फिर भूरू को ऊपर से धीरे-धीरे नीचे रखा।
भूरू ने चप्पल में नाक घुसाई। गोल घूमा, एक बार, दो बार। फिर पूँछ समेटकर बैठ गया।
मीतू साँस रोके देखती रही। भूरू बाहर नहीं निकला।
बरामदे में नीली लालटेन टिमटिमा रही थी। टोकरी से धीमी आवाज़ आई, फुर्र-फुर्र, फुर्र-फुर्र। मीतू टोकरी के पास ही लेट गई, और उसकी उँगली पर भूरू की गरम साँस आती रही।