ऋतुएं और मौसमहिन्दी
मीनू और ठंडा पेड़
"मुझे ठंड लग रही है," आँगन के नीम ने धीरे से कहा। मीनू ने यह सुना और झट से दौड़ी आई।
नीम रोज़ मीनू से बातें करता था। इसमें किसी को अचरज नहीं था। पर आज उसकी डालियाँ लगभग खाली थीं। सरर-सरर, एक पीला पत्ता गिरा।
"मेरे पत्ते जा रहे हैं," नीम ने कहा। "अब मैं नंगा हो जाऊँगा।"
"मैं तुम्हें गरम रखूँगी," मीनू ने कहा। "मैं पत्ते वापस लगा दूँगी।"
उसने एक पत्ता उठाया और डाली पर रख दिया। सरर-सरर, वह फिर नीचे आ गया। उसने धागे से पत्ता बाँधा। हवा चली, धागा खुल गया, पत्ता फिर गिरा।
"अच्छा, कंबल उढ़ाती हूँ," मीनू बोली। वह घर गई और दादी से पूछा, "दादी, मैं अपना कंबल नीम को दे दूँ?"
"नहीं बिटिया," दादी ने कहा। "कंबल बाहर भीग जाएगा। अभी नहीं।"
मीनू आँगन में लौटी और उदास होकर बैठ गई। उसके पास सूखे पत्तों का ढेर लगा था। उसने उसमें हाथ डाला। ढेर नरम था और अंदर से गरम भी।
"अरे!" मीनू उछल पड़ी। "पत्ते ही तो कंबल हैं!"
उसने दोनों हाथों में पत्ते भरे और नीम की जड़ों के चारों ओर रख दिए। फिर और पत्ते, फिर और। ढेर ऊँचा होता गया।
तभी ढेर के पास कुछ खिसका। एक छोटा-सा कँटीला साही निकला। वह सर्दी की नींद के लिए बिस्तर ढूँढ रहा था। उसने मीनू की ओर देखा भी नहीं। वह सीधा पत्तों में घुस गया। कड़-कड़, कड़-कड़! ढेर हिला, फिर चुप हो गया।
मीनू हँस पड़ी, पर धीरे से, ताकि साही न जागे।
"आह," नीम ने कहा। "मेरे पैर गरम हो गए।"
मीनू नीम से टिककर बैठ गई। ऊपर से एक पत्ता घूमता हुआ आया और उसकी नाक पर बैठ गया। नीचे ढेर के अंदर से हल्की-सी खर्राटे की आवाज़ आ रही थी।