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दोस्ती और दयालुताहिन्दी

गुड़िया का हरा घर

तनु ने पौधों वाले शीशे के घर में एक छोटा गड्ढा देखा। उसमें पानी भरा था। तनु ने पैर रखा तो धुम! पानी ढोल की तरह बज उठा। यहाँ सब जानते थे कि गड्ढे का पानी ऐसे ही बजता है।

तनु को बस कूदना था, धुम-धुम, बार-बार। पास में उसका दोस्त चिंटू बैठा था। वह अपने गमले के अंकुर को पानी पिला रहा था। अंकुर आज ही निकला था, बस दो नन्ही हरी पत्तियाँ।

“चिंटू, देखो!” तनु ने ज़ोर से छलाँग लगाई। छपाक! कीचड़ उड़ा। चिंटू का गमला लुढ़क गया, और अंकुर मिट्टी में जा गिरा।

गमला लुढ़कता गया। तनु उसे पकड़ने दौड़ी, पर जैसे ही हाथ बढ़ाती, वह आगे सरक जाता। आखिर वह एक बोरी से टकराकर रुका।

“तुमने मेरा अंकुर गिरा दिया!” चिंटू ने मुँह फेर लिया।

तनु ने जल्दी से कहा, “सॉरी!” और दूर भाग गई। चिंटू ने कुछ नहीं कहा।

तनु ने सोचा, शायद ढोल सुनकर वह हँस देगा। वह गड्ढे में कूदी। धुम-धुम! पर चिंटू और उदास हो गया।

तनु रुक गई। उसने देखा कि अंकुर मिट्टी में टेढ़ा पड़ा है, जैसे थककर सो गया हो। उसे लगा, सॉरी तो इसे भी कहना है।

वह धीरे से पास गई। उसने दोनों हाथों से मिट्टी समेटी और अंकुर को सावधानी से उठाया। उसे गमले में बिठाया और चारों ओर मिट्टी दबा दी।

फिर वह चिंटू के सामने बैठी और उसकी आँखों में देखकर बोली, “सॉरी, चिंटू। मैंने तुम्हारा अंकुर गिरा दिया। मुझसे गलती हो गई।”

चिंटू ने अंकुर को देखा। दोनों पत्तियाँ सीधी खड़ी थीं। “ठीक है,” वह बोला। “अब थोड़ा-सा पानी तुम पिलाओ।”

उसने अपना छोटा झारा तनु को दे दिया। तनु ने बहुत धीरे से पानी डाला। पत्तियाँ हल्के से हिलीं।

गड्ढे में एक बूँद टपकी। धुम, बहुत धीमे से।