दोस्ती और दयालुताहिन्दी
जामुन की बाल्टी
“यह मेरी बाल्टी है, मैं इसे अकेले भरूँगा,” गोलू ने कहा।
उसके हाथ में नई लाल बाल्टी थी। वह बाग़ में जामुन तोड़ने आया था। उसे पूरी बाल्टी भरनी थी, ऊपर तक।
पास में चुन्नी खड़ी थी। वह रोज़ बाग़ के फ़व्वारे को गाना सुनाने आती थी। जब कोई गाता, फ़व्वारा पानी की जगह बुलबुले उछालता। बाग़ में किसी को यह अजीब नहीं लगता था।
“मैं तुम्हारी बाल्टी पकड़ लूँ?” चुन्नी ने पूछा।
“नहीं। मेरी बाल्टी, मेरे जामुन।”
चुन्नी फ़व्वारे के पास चली गई और धीरे-धीरे गाने लगी। बुलबुले साबुन के गुब्बारों जैसे ऊपर उठने लगे।
गोलू ने नीचे की डाल से जामुन तोड़े। वे हरे-गुलाबी थे। उसने एक चखा। “आक्थू! खट्टा!”
उसने ऊपर देखा। काले-बैंगनी पके जामुन बहुत ऊँचे लटके थे। गोलू कूदा, पर हाथ नहीं पहुँचा। वह पंजों के बल खड़ा हुआ, फिर भी नहीं पहुँचा। उसने पेड़ को हिलाया। बस एक पत्ता उसकी नाक पर गिरा।
बाल्टी अब भी ख़ाली थी। गोलू धम से बैठ गया।
तभी उसने देखा, चुन्नी के बुलबुले सीधे ऊपर जा रहे थे, पके जामुनों तक। गोलू ने बाल्टी को देखा। फिर उसने उसे उलटा किया और उस पर चढ़कर देखा। अरे, वह तो ऊँची हो गई!
“चुन्नी! अपनी फ्रॉक फैलाओ! मैं तोड़ूँगा, तुम पकड़ना!”
चुन्नी दौड़ी आई। गोलू बाल्टी पर चढ़ा और जामुन तोड़े। टप, टप, टप! जामुन चुन्नी की फ्रॉक में गिरे। एक जामुन लुढ़ककर उसकी चप्पल पर जा बैठा।
“अब तुम चढ़ो,” गोलू ने कहा। “ऊपर वाले और भी हैं।”
चुन्नी चढ़ी और गाना गाने लगी, ज़ोर से। फ़व्वारे से एक बहुत बड़ा बुलबुला निकला। वह गोलू की नाक पर आकर फट गया। “पुच!”
दोनों हँस पड़े।
फिर गोलू ने बाल्टी सीधी की और चुन्नी ने फ्रॉक से जामुन उसमें उँडेल दिए। बाल्टी में काले-बैंगनी जामुन लुढ़कने लगे, और उनके ऊपर एक आख़िरी बुलबुला धीरे से उतरकर चमकता रहा।