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दोस्ती और दयालुताहिन्दी

झूले वाला बगीचा

तारा झूले की रस्सी पकड़कर पंजों के बल खड़ी थी। बस, अब उसकी बारी आने वाली थी। उसे झूले पर बैठकर हवा में उड़ना था।

पर झूले पर भोलू बैठा था। वह ऊपर जा रहा था, और ऊपर, और ऊपर।

बगीचे का फाटक खुला और गाने लगा, “ची-ची, ला-ला।” इस बगीचे का फाटक हमेशा ऐसे ही गाता था।

“भोलू, मेरी बारी कब आएगी?” तारा ने पूछा।

“थोड़ी देर में,” भोलू ने कहा। वह रुका नहीं।

तारा ने इंतज़ार किया। फिर उसने कहा, “भोलू, अब मुझे दो न!” भोलू बोला, “अभी नहीं। मुझे आम की डाली छूनी है।”

तारा ने ऊपर देखा। आम की एक हरी पत्ती हवा में हिल रही थी। भोलू अपने पैर के पंजे से उसे छूना चाहता था। पर हर बार पत्ती थोड़ा-सा दूर रह जाती थी।

तारा ने सोचा, “भोलू को उसकी पत्ती चाहिए, और मुझे मेरा झूला।”

फिर उसे एक बात सूझी। “भोलू, मैं तुम्हें पीछे से धक्का देती हूँ। तुम और ऊँचे जाओगे। पर दस तक गिनकर तुम उतर जाना। फिर मैं बैठूँगी।”

“ठीक है!” भोलू हँस पड़ा।

तारा ने धक्का दिया। “एक, दो, तीन…” झूला ऊँचा गया, और ऊँचा। “आठ, नौ, दस!”

भोलू ने पैर बढ़ाया। टप! उसके पंजे ने पत्ती छू ली। पर उसकी एक चप्पल उड़कर घास में जा गिरी, फट!

दोनों खूब हँसे।

भोलू झूले से उतरा। उसने चप्पल उठाई और बोला, “अब तुम बैठो। मैं गिनूँगा।”

तारा झूले पर बैठ गई। भोलू ने धक्का दिया। “एक, दो, तीन…”

हवा तारा के बालों में घुस गई। झूला चर्र-चर्र करता रहा। दूर फाटक फिर गा उठा, “ची-ची, ला-ला।” आम की पत्ती हिलती रही, और झूला धीरे-धीरे आगे-पीछे झूलता रहा।