दोस्ती और दयालुताहिन्दी
मीनू और लाल टमाटर
“कोई है क्या?” ग्रीनहाउस के पीछे से किसी ने धीरे से पूछा, और मीनू दबे पाँव उसी तरफ़ चल दी।
मीनू को एक दोस्त चाहिए था। नानी के ग्रीनहाउस में भाप जैसी गर्मी थी, और कतारों में पके टमाटर लटके थे। बगल के घर में कल ही एक नया लड़का आया था। मीनू उसके साथ खेलना चाहती थी।
पौधों के पीछे वही लड़का खड़ा था। उसका नाम टोनू था। वह एक बड़े लाल टमाटर को तोड़ने की कोशिश कर रहा था। टहनी झुकती थी, पर टमाटर नहीं छोड़ती थी।
“नमस्ते! मैं मीनू हूँ,” मीनू ने कहा।
टोनू ने कुछ नहीं कहा। वह बस अपने पैरों को देखता रहा।
“मैं तोड़ दूँ?” मीनू ने पूछा। उसने टहनी को पकड़कर ज़ोर से खींचा। टहनी झुकी, झुकी, और फिर बोइंग! वापस उछल गई। एक पत्ता सीधा मीनू की नाक पर लगा।
टोनू ने मुँह पर हाथ रख लिया, पर हँसा नहीं।
मीनू ने नाक रगड़ी। तभी उसकी नज़र टोनू के पैरों पर गई। एक जुराब पीली थी, दूसरी नीली।
मीनू ने भी अपना पैर उठाया। उसकी एक जुराब लाल थी, दूसरी धारीदार।
“मेरी जुराबें रात में साथी बदल लेती हैं,” मीनू ने कहा। “मैं रोज़ जोड़ी बनाती हूँ, फिर भी।”
“मेरी भी!” टोनू बोला। “सुबह देखो तो हमेशा अलग-अलग।”
“जुराबें तो ऐसी ही होती हैं,” दोनों ने एक साथ कहा। फिर दोनों खिलखिलाकर हँस पड़े।
अब मीनू को एक तरकीब सूझी। “तुम टहनी को नीचे पकड़ो, मैं टमाटर को घुमाऊँगी।”
टोनू ने टहनी थामी। मीनू ने टमाटर को धीरे-धीरे घुमाया। टप! टमाटर उसके हाथ में आ गया।
“पहले तुम खाओ,” मीनू ने कहा।
“नहीं, पहले तुम,” टोनू बोला।
“ठीक है, तुम बड़ा वाला लो, मैं अगला तोड़ूँगी।”
फिर मीनू ने दूसरा टमाटर तोड़ा। दोनों ने एक साथ कटक से काटा। रस मीनू की ठोड़ी से बहने लगा। काँच की छत पर धूप चमक रही थी, और ज़मीन पर पीली-नीली और लाल-धारीदार जुराबें एक-दूसरे के पास-पास खड़ी थीं।