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समुदाय के सहायकहिन्दी

लाइब्रेरी का शांत कोना — सोने से पहले की एक कहानी

मीनू की हिचकी बाकी सबकी हिचकी जैसी नहीं थी। उसकी हिचकी साइकिल की घंटी की तरह बजती थी: टिंग!

मीनू को लाइब्रेरी का शांत कोना सबसे अच्छा लगता था। वहाँ एक नरम गद्दी थी और हरे मेंढक वाली किताब थी। आज मीनू सीधे वहीं गई।

पर कोना खाली नहीं था। गद्दी पर एक मोटी भूरी बिल्ली सो रही थी, गोल, गरम रोटी जैसी। वह लाइब्रेरी की बिल्ली थी, और वह रोज़ यहीं सोती थी।

मीनू ने धीरे से किताब उठाई। तभी, टिंग!

बिल्ली का एक कान हिला। मीनू ने मुँह पर हाथ रख लिया। "श्श्श," उसने खुद से कहा। "शांत कोने में घंटी नहीं बजती।"

उसने साँस रोकी। एक, दो, तीन... टिंग!

फिर उसने पानी की बोतल उठाई और ज़ोर से घूँट भरा। टिंग! पानी थोड़ा छलक गया। बिल्ली ने एक आँख खोली, मीनू को देखा और फिर बंद कर ली।

मीनू गद्दी के पास बैठ गई। अब क्या करे? तभी उसने देखा कि बिल्ली का पेट ऊपर-नीचे, ऊपर-नीचे हो रहा है। और साथ में आवाज़ आ रही है: घर्र... घर्र...

मीनू ने फुसफुसाकर कहा, "धीरे-धीरे। साँस अंदर, साँस बाहर।"

उसने बिल्ली की तरह साँस ली। अंदर, बाहर। अंदर, बाहर। घर्र... घर्र... उसके कंधे ढीले हो गए। उसकी पलकें भारी हो गईं।

कोई टिंग नहीं आया।

मीनू ने मेंढक वाली किताब खोली। पन्ना पलटा। बिल्ली ने नींद में पंजा फैलाया और मीनू के घुटने पर रख दिया, गरम और भारी।

"धीरे-धीरे," मीनू ने बहुत धीमे से कहा।

कोने में बस बिल्ली की घर्र-घर्र थी, और पन्ने पलटने की हल्की आवाज़।