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परिवार और घरहिन्दी

हाथियों का परिवार — सोने से पहले की एक कहानी

टुन्नू पूरे हाथी परिवार में अकेला ऐसा हाथी था, जो अपनी सूँड़ से सीटी बजा सकता था।

उस रात उसे नींद नहीं आ रही थी। कल सुबह सब बर्फ़ वाली पहाड़ी पर फिसलने जाएँगे! दादी ने कहा था, "जब सूरज पहाड़ी के ऊपर झाँकेगा, तब चलेंगे।"

पर आसमान अभी काला था।

टुन्नू ने मम्मी की सूँड़ हिलाई। "मम्मी, चलें?"

"अभी नहीं, बेटा," मम्मी ने आँखें बंद किए-किए कहा। "सूरज अभी सो रहा है।"

टुन्नू ने तारे गिने। एक, दो, तीन... बीस तक गिने, फिर भूल गया। सूरज नहीं आया।

उसने दादा जी की पूँछ खींची। दादा जी खर्राटों में बोले, "घर्र... अभी नहीं, बेटा।"

टुन्नू उदास होकर नदी के पुल तक चला गया। यह पुल बड़ा अनोखा था। उस पर हर क़दम पर अलग सुर निकलता था। टुन्नू ने पैर रखा। "टूं!" दूसरा रखा। "टीं!" तीसरा रखा। "टां!"

तभी टुन्नू को एक बात सूझी। सूरज को वह बुला नहीं सकता था, पर गाना तो बजा सकता था! वह सुरों के साथ सीटी बजाने लगा। टूं, टीं, टां, फीं-फीं-फीं। फिर उसका पैर ज़रा फिसला और पुल बोला, "पिंक!"

टुन्नू हँस पड़ा।

तभी पीछे से आवाज़ आई, "ये कौन गा रहा है?" मम्मी आ गई थीं। फिर दादी आईं, फिर दादा जी, आँखें मलते हुए। मम्मी का क़दम पड़ा, "टूंऽऽ!" दादी का क़दम पड़ा, "टाँऽऽ!" दादा जी का भारी क़दम पड़ा, "गूँऽऽ!"

पूरा परिवार पुल पर गुनगुना रहा था, और टुन्नू सबसे आगे सीटी बजा रहा था।

वे पहाड़ी पर पहुँचे। तभी पहाड़ी के ऊपर सूरज झाँका, गोल रोटी जैसा, लाल-लाल।

"अब," दादी ने मुस्कुराकर कहा।

टुन्नू बर्फ़ पर बैठा और सरर्र... नीचे फिसल गया। ठंडी बर्फ़ उसके पेट को गुदगुदा रही थी, और पीछे से पुल की धीमी-धीमी गुनगुन आ रही थी।