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ऋतुएं और मौसमहिन्दी

बारिश का दिन — सोने से पहले की एक कहानी

मीनू के जूते चलते समय चूँ-चूँ बोलते थे। पूरी गली में किसी और के जूते ऐसे नहीं बोलते थे।

उस दिन सुबह से बारिश हो रही थी। नीम के पेड़ के नीचे एक बड़ा पोखर बन गया था। मीनू के हाथ में कागज़ की नाव थी। उसे बस एक काम करना था। नाव को पोखर में तैराना।

“शाम तक धूप निकल आएगी,” दादी ने कहा। “फिर पोखर सूख जाएगा।”

मीनू दौड़ पड़ी। चूँ-चूँ, चूँ-चूँ।

उसने नाव को पानी पर रखा। नाव थोड़ी देर तैरी। फिर वह भीग गई, झुक गई और गुलुप! डूब गई।

मीनू ने मोटे कागज़ की दूसरी नाव बनाई। वह भी भीगी और बैठ गई।

“अब क्या करूँ?” मीनू ने धीरे से कहा।

पोखर के किनारे एक मेंढक बैठा था। वह नाव देखने नहीं आया था। वह तो बारिश में गाना गाने आया था। “टर्र-टर्र, टर्र-टर्र!”

मीनू उसे देखती रही। तभी उसने पास में एक बड़ा हरा पत्ता देखा। उस पर बूँदें गिर रही थीं, पर पत्ता गीला नहीं हो रहा था। बूँदें फिसलकर लुढ़क जाती थीं।

“अरे! पत्ते को पानी नहीं लगता!” मीनू बोली।

उसने पत्ता उठाया और पोखर में रख दिया। पत्ता हरी थाली की तरह तैरने लगा। मीनू ने अपनी नाव उस पर बिठा दी। नाव सूखी रही।

तभी मेंढक उछला और छपाक! पत्ते पर आ बैठा। पत्ता गोल-गोल घूमने लगा। नाव डगमगाई, पर गिरी नहीं।

“तुम भी सवारी करोगे?” मीनू हँस पड़ी। मेंढक ने कुछ नहीं कहा। वह अपना गाना गाता रहा।

पत्ता धीरे-धीरे पोखर के बीच पहुँच गया। मीनू किनारे पर खड़ी थी। वह ज़रा हिली और उसके जूते बोले, चूँ-चूँ।

पत्ते पर बूँदें टप-टप गिरती रहीं। मेंढक गाता रहा। टर्र-टर्र, टर्र-टर्र।